​मितानिनों का दर्द: सेवा के बदले मिला सिर्फ उपेक्षा, अब करेंगी मुख्यमंत्री निवास का घेराव

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रायपुर: छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली मितानिनें, जिन्हें लोग प्यार से ‘दीदी’ कहते हैं, आज सड़कों पर हैं। 7 अगस्त से जारी उनकी अनिश्चितकालीन हड़ताल ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह से ठप कर दिया है। 75,000 से भी अधिक ये मितानिनें, जो गांव-गांव में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाती हैं, अब अपने हक के लिए सरकार से लड़ रही हैं।

कौन हैं ये मितानिनें और इनका काम क्या है?

​मितानिनें सिर्फ सरकारी कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण समाज का एक अभिन्न अंग हैं। ये बिना किसी छुट्टी के, दिन-रात काम करती हैं:

गर्भवती महिलाओं की देखभाल: रात के 2 बजे भी किसी आपात स्थिति में गाँव की गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाने में मदद करती हैं।

बच्चों का टीकाकरण: बच्चों के नियमित टीकाकरण का ध्यान रखती हैं और कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

​प्राथमिक उपचार: गाँव में जहाँ डॉक्टर या दवाखाना दूर होता है, वहाँ ये प्राथमिक उपचार की सेवाएँ भी देती हैं।

​यह इस बात का सबूत है कि मितानिन मॉडल कितना सफल रहा है कि 2002 में छत्तीसगढ़ में शुरू हुए इस क्रांतिकारी कार्यक्रम के बाद ही, केंद्र सरकार ने 2005 में इसी मॉडल पर देशव्यापी आशा (ASHA) कार्यकर्ता योजना शुरू की थी।

क्यों हो रहा है विरोध?

​इतने महत्वपूर्ण काम के बावजूद, मितानिनों को न तो सम्मानजनक मेहनताना मिलता है और न ही उनकी नौकरी स्थायी है। वे लंबे समय से इन तीन मुख्य मांगों को लेकर संघर्ष कर रही हैं:

​मानदेय में वृद्धि और स्थायी वेतनमान: उनके काम के घंटे तय नहीं हैं, फिर भी उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं।

नौकरी का नियमितीकरण (Permanent Job Status): वे चाहती हैं कि उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए, ताकि उनकी और उनके परिवार की ज़िंदगी सुरक्षित हो सके।

​पेंशन और बीमा का लाभ: वर्षों की सेवा के बाद, बुढ़ापे के लिए उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती।

​अब आगे क्या?

​सरकार की उपेक्षा से नाराज़ होकर, इन लाखों मितानिनों ने एक बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो 4 सितंबर को 75,000 से अधिक मितानिनें राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री निवास का घेराव करेंगी। यह केवल एक हड़ताल नहीं है, बल्कि उन लाखों महिलाओं की आवाज़ है जिन्होंने अपना जीवन लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया है। अब यह देखना होगा कि क्या सरकार उनकी इस आवाज़ को सुनेगी या फिर छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को और गहरे संकट में धकेलेगी।

Deepak Vaishnava
Author: Deepak Vaishnava

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