
राजनांदगांव, छत्तीसगढ़: आज राजनांदगांव की सड़कें उस ज्वालामुखी की तरह धधक उठीं, जो दशकों से शांत था। हज़ारों की संख्या में मितानिन दीदियों का आक्रोश, जिसे सरकार वर्षों से नजरअंदाज करती आ रही थी, अब एक सैलाब बनकर कलेक्ट्रेट की ओर उमड़ पड़ा। इन महिलाओं ने अपने बुलंद नारों और तख्तियों के साथ न सिर्फ प्रशासन को घेरा, बल्कि सीधे तौर पर सरकार की “मोदी की गारंटी” पर सवाल खड़े कर दिए।
वादे और हकीकत: एक तीखा विरोधाभास
एक तरफ पूरे देश में सुशासन और कल्याण के वादे गूंज रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियाद मानी जाने वाली मितानिनें अपने मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। इन महिलाओं ने मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर तक को जो ज्ञापन सौंपा है, उसमें साफ़ लिखा है कि वे चुनावी घोषणा पत्र में किए गए उन वादों को पूरा करवाने आई हैं। ये वो वादे हैं जो उन्हें सम्मान, सुरक्षा और एक स्थायी भविष्य देने की बात करते थे।
लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। मितानिनों को आज भी स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है, उनका मानदेय इतना कम है कि परिवार का गुज़ारा तक मुश्किल है। प्रदर्शन में शामिल एक मितानिन ने बताया, “हमने कोरोना में अपनी जान की परवाह नहीं की, दिन-रात एक कर दिया। अब जब सरकार अपने वादे पूरे नहीं कर रही, तो हम कहां जाएं? क्या हमारी सेवा का यही इनाम है?
‘ठेका प्रथा’ और ‘दिल्ली के एनजीओ’ के खिलाफ जंग
यह आंदोलन केवल वेतन वृद्धि का नहीं, बल्कि स्वाभिमान की लड़ाई है। मितानिनें ‘ठेका प्रथा’ को तत्काल बंद करने की मांग कर रही हैं। उनका मानना है कि ठेका प्रणाली से उनकी नौकरी असुरक्षित हो जाती है और उनका शोषण होता है। सबसे बड़ा विरोध इस बात को लेकर है कि मितानिन कार्यक्रम को फिर से किसी दिल्ली स्थित एनजीओ को सौंपा जा रहा है। इस कदम को वे अपनी वर्षों की मेहनत और अनुभव का अपमान मानती हैं। उनके नारे “ठेका प्रथा बंद करो” और “दिल्ली की NGO वापस जाओ” उनके गहरे आक्रोश को दर्शाते हैं।
यह चेतावनी है, सरकार की परीक्षा का समय है
मितानिनों ने साफ कर दिया है कि यदि एक सप्ताह के भीतर उनकी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आंदोलन पूरे राज्य में फैलेगा। उनके संघ ने 72,000 मितानिनों के साथ मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने की चेतावनी दी है। यह केवल एक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह सरकार के लिए एक अंतिम चेतावनी है। अगर इन बेजुबान योद्धाओं की आवाज को अब भी अनसुना किया गया, तो इसका सीधा असर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र पर पड़ेगा, और सरकार की विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात लगेगा।


