राजनांदगांव | 23 अप्रैल 2026
धान की खेती करने वाले किसानों के लिए अब एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प सामने आया है। वास्तव में, कृषि विज्ञान केंद्र की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गुजन झा ने नील हरित शैवाल (Blue Green Algae – BGA) को धान के लिए ‘प्राकृतिक वरदान’ बताया है। इसके प्रयोग से किसान न केवल यूरिया पर होने वाले खर्च को कम कर सकते हैं, बल्कि मिट्टी की सेहत में भी सुधार कर सकते हैं।
नील हरित शैवाल के जादुई लाभ
यह शैवाल वायुमंडल से नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी में स्थिर करता है। इसके फलस्वरूप, प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन की बचत होती है। निश्चित रूप से, यह धान की उपज में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि करने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त, यह मिट्टी को भुरभुरा बनाता है और जड़ों के विकास में भी काफी सहायक है।
घर पर कैसे तैयार करें कल्चर?
- तैयारी: 2×2 मीटर का एक गड्ढा खोदें।
- मिश्रण: 100 किलो मिट्टी और 15 किलो गोबर की खाद मिलाएं।
- प्रक्रिया: 5 सेमी पानी भरें और 200 ग्राम सुपर फास्फेट डालें।
- कल्चर: बाजार से मिले 1-2 किलो नील हरित शैवाल का कल्चर डालें।
- परिणाम: 10-15 दिनों में ऊपर नीली-हरी परत बन जाएगी, जिसे सुखाकर छिड़काव करें।
उपयोग में रखें सावधानी
वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी भी दी है कि केवल प्रमाणित प्रयोगशाला उत्पादों का ही उपयोग करें। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त शैवाल में कभी-कभी विषाक्त पदार्थ हो सकते हैं। अतः, हमेशा कृषि केंद्रों से प्राप्त स्टार्टर कल्चर का ही चयन करें। परिणामस्वरूप, सुरक्षित और जैविक खेती का लाभ किसानों को मिलेगा।
“यूरिया पर निर्भरता घटाएं और नील हरित शैवाल अपनाएं; खेती की लागत कम होगी और मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ रहेगी।”
अंततः, धान रोपाई के 7-10 दिन बाद, जब खेत में पानी भरा हो, तब इसका 10 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना सबसे उत्तम माना जाता है। इसलिए, किसानों को इस सरल तकनीक को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। निश्चित रूप से, यह जैविक क्रांति की दिशा में एक बड़ा कदम है।
संपादक: दीपक वैष्णव




