उत्सव से संकल्प तक की यात्रा, संविधान निर्माता को सच्ची श्रद्धांजलि ​: छात्रा प्रशिका रामटेके का लेख

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​➡️ लेखक: प्रशिका रामटेके (छात्रा, कक्षा दसवीं)

भूमिका:

“मन की स्वतंत्रता ही सच्ची स्वतंत्रता है।” विश्वरत्न, ज्ञान के सूर्य और भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि समानता, स्वाभिमान और आत्मचिंतन का महापर्व है। कक्षा दसवीं की छात्रा प्रशिका रामटेके ने अपनी कलम से बाबा साहेब के सिद्धांतों और आज के युवाओं की जिम्मेदारी पर एक बेबाक विश्लेषण साझा किया है।

​मन की आजादी ही जीवित होने का प्रमाण

​डॉ. अंबेडकर कहते थे कि एक व्यक्ति जिसका मन स्वतंत्र नहीं है, भले ही वह जंजीरों में न हो, वह गुलाम है। वह जेल में न होकर भी कैदी है और जीवित होकर भी मृत के समान है। मन की आजादी ही इस बात का सबूत है कि व्यक्ति अपने जीवित अस्तित्व में है।

​इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए यह समझना आवश्यक है कि जिसका हृदय सबके लिए खुला नहीं है, वह भी स्वतंत्र नहीं है। इस पावन अवसर पर हमें शपथ लेनी चाहिए कि हम अपने हृदय और मन को समानता के अनुकूल ढालें। यदि हम अपनी सोच बदलेंगे, तो नैतिक मूल्यों की प्राप्ति अपने आप होने लगेगी।

रैलियों से आगे, संकल्प का दिन

​याद रहे, 14 अप्रैल केवल एक उत्सव मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह याद रखने का दिन है कि बाबा साहेब ने एक विशाल और गौरवशाली राष्ट्र को संविधान दिया, जिसने विविधता को एकता के सूत्र में पिरोया। यह दिन हर उस व्यक्ति के लिए है जो एक समृद्ध राष्ट्र की स्थापना में सहयोग देना चाहता है।

​हमें आत्मसात करना होगा कि समानता, आजादी और भाईचारे का यह केवल पर्व नहीं, बल्कि इन्हें जीवन में उतारने का संकल्प है। यदि हम अपना पूरा समय केवल रैलियों और भाषणों में देंगे, तो उनके सिद्धांतों पर अमल कब होगा? आदर्श स्थिति वह है जहाँ “एक हाथ में उत्सव हो और दूसरे हाथ में उनके सिद्धांतों पर चलने का दृढ़ संकल्प।”

संविधान: हमारी सामूहिक पहचान

​मेरे नजरिए से बाबा साहेब के आदर्श जाति, धर्म और समाज से ऊपर उठकर एक उन्नत राष्ट्र बनाने की सोच रखते हैं। आज के दौर में उन महान विचारकों के आदर्शों की चमक बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।

​भारत जैसे विविधताओं वाले देश में बाबा साहेब के विचार हमारी शक्ति को चार गुना बढ़ा देते हैं। विशेषकर युवाओं के लिए, यह जयंती नैतिक मूल्यों के साथ जीवन जीने की एक नई राह दिखाती है। अंततः, भारतीय संविधान केवल एक लिखित दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हम सभी भारतीयों की पहचान है।

जय भीम!

Deepak Vaishnava
Author: Deepak Vaishnava

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